दाल रोटी चावल सदियों से नारी ने इसे पका पका कर राज्य किया हैं , दिलो पर , घरो पर। आज नारी बहुत आगे जा रही हैं सब विधाओं मे पर इसका मतलब ये नहीं हैं कि वो अपना राज पाट त्याग कर कुछ हासिल करना चाहती हैं। रसोई की मिलकियत पर से हम अपना हक़ तो नहीं छोडेगे पर इस राज पाट का कुछ हिस्सा पुरुषो ने होटल और कुछ घरो मे भी ले लिया हैं।

हम जहाँ जहाँ ये वहाँ वहाँ

Friday, July 4, 2008

दाल मुरादाबादी




सामग्री:



धुली मूंग की दाल (एक मुठ्ठी प्रति व्यक्ति काफ़ी होती है)

स्वाद के हिसाब से नमक

एक या दो काग़ज़ी नींबू

छौंक के लिये: हिसाब से घी, थोड़ी सी हींग और पांच-दस साबुत लाल मिर्च

थोड़ा सा भुने जीरे का पाउडर



बनाने की विधि:



वैसे तो उस्तादों का कहना है कि इस दाल का स्वाद तभी आता है जब इसे चीड़ की सौंधी लकड़ियों की मंद आंच पर मिट्टी की हांडी में चार से पांच घन्टे पकाया जाय. लेकिन सुविधा के लिए प्रेशर कुकर से काम चलाया जा सकता है. कुकर में हिसाब से पानी और नमक डालकर आठ से दस मिनट तक पकाएं और इस पकी हुई दाल को बढ़िया से घोट लें. अगर ज़्यादा गाढ़ी दिख रही हो तो पानी डाल कर थोड़ा और उबाल लें. कुछ लोग इस में करी पत्ता भी डाल कर उबालते हैं.



इस में स्वाद के हिसाब ही से थोड़ा सा नींबू का रस और जीरे का पाउडर डाल कर फिर से घोटें.



इसमें स्वाद छौंक से आता है. छौंक के लिये घी में थोड़ी सी हींग और लाल मिर्चों का उपयोग किया जाता है. गरमागरम छौंक को चाहें तो पूरी दाल में डाल लें या अलग अलग कटोरों में. बस हो गई दाल मुरादाबादी तैयार. इस सुपाच्य और अतिस्वादिष्ट व्यंजन को खाने से पहले सूप की तरह परोसा जाता है.



(बनाने का समय: करीब चौदह मिनट तेईस सेकेंड)

11 comments:

advocate rashmi saurana said...

daal lag to bhut achhi rhi hai. abhi banati hu.

mehek said...

bahut swadisht dal lag rahi hai,jarur banake dekhenge,tasveer dekh ke hi muh mein pani aa gaya

anitakumar said...

इसका नाम मुरादाबादी क्युं है? मेरे ख्याल से सब जगह इसे ऐसे ही बनाया जाता है।

Lavanyam - Antarman said...

Ashok bhai, aapne bahut achchee tarah Daal Muradabadee banane ki vidhi batayee - aise hee bana ke dekhenge.

Ashok Pande said...

अनीता जी पता नहीं क्यों यह नाम पड़ा. वैसे हमारे नगर हल्द्वानी में इस दाल के दो विश्वविख्यात ठेले लगते हैं. यक़ीन कीजिये उनका सारा माल देखते फ़ेखते चट हो जाता है. एक हैं 'लल्लन मुरादाबादी दाल वाले' और दूसरे हैं 'बुद्धूमल की फेमस दाल मुर्दाबादी'. इसके अलावा इसे शादियों में मुख्य खाने से पहले वाले आइटमों के मेन्यू में इन दिनों जगह मिलने लगी है. वहां भी यही नाम से पुकारा जाता है. छोड़िये भी. नाम में क्या धरा है?

रचना said...

अशोक जी आप ने रसोई मे चार चाँद लगा दिये . लखनऊ मे भी ये दाल ठेलो पर बिकती हैं . अनीता जी और मेरी बात को मान दे कर आपने ब्लॉग न केवल जोईन किया अपितु जल्दी ही कुछ खिलाया इसके लिये तहेदिल से थैंक्स

रंजू ranju said...

आसान और मेरी मनपसंद दाल की विधि बतायी आपने ..शुक्रिया

अजित वडनेरकर said...

अनिता जी , सभी रसोइयों में यह दाल इस तरह नहीं पकती। अशोक जी , मेरी मुराद आप पूरी करने जा रहे हैं ये नहीं पता था। इस प्रसिद्ध दाल का मैं तो दीवाना हूं। मुरादाबाद जितनी बार जाना हुआ , दिन में दो तीन बार इसका आनंद लिया जाता रहा। उधर हरिद्वार में भी कनखल चौक पर एक नुक्कड़ पर ये दाल ठाठ से पकती है।
दो चीज़े इसमें आप भूल गए है जो इसमें चार चांद लगाती हैं 1. ताज़े मक्खन की डली 2. अदरक की लंबी लंबी ,नींबूं में भीगी हुई कतलियां ।
इसे लकड़ी की खपच्चियों से खाने का मज़ा ही कुछ और है। मिट्टी की हांडी में , धुंआर के साथ इसके ज़ायके का कहना ही क्या !!!! उम्म...यम्म यम्म...

Vivek Rastogi said...

वाह अनीताजी,
वैसे तो मुझे भी यह दाल बहुत ही पसंद है क्योंकि मैं भी उत्तर प्रदेश का रहने वाला हूं पर आपने पकाने का पारंपरिक तरीका दिया है, अब घर पर जाकर प्रयोग करुंगा। क्या यह दाल कहीं दिल्ली में खाने को मिल सकती है।

अजित वडनेरकर said...

अजी रस्तोगी जी, दाल तो पांडे जी ने पकाई है। अनिताजी तो उसे सबकी रसोई के लिए पकवाया है :)

मीनाक्षी said...

यह दाल तो हमारी पसन्द की है... किसी भी विधि से बनाई जाए...खाने में हर तरह से स्वादिष्ट...