खाना बनाना हमारे लिए कभी ज़हमत का काम नहीं रहा। अलबत्ता दाल रोटी चावल के लिए रेसिपी लिखना ज़रूर बोझ लग रहा था। वजह दो थीं एक तो यह कि
शब्दों के सफरपर करीब करीब रोज़ लिखना हमारी मजबूरी है। दूसरी, रेसिपी तो ढेरों गिनाई जा सकती हैं मगर प्रामाणिकता के लिए तस्वीरें ज़रूरी है। सो , जब तक हम रसोई में नहीं घुसेंगे , रेसिपी तैयार कैसे होगी, तस्वीरें कैसे खींची जाएंगी। बस , यही अड़चन थी। मगर अब जब
अनिताजी/रचनाजी ने अल्टीमेटम दे ही दिया है तो श्रीगणेश कर ही डालते हैं। जिस डिश को हमने दाल रोटी चावल के लिए चुना है वह है
पालक कोफ्ता कढ़ी । जी हां, ये विशुद्ध हमारी विधि है, आनन-फानन में इसका आइडिया दिमाग़ में आया और बड़े प्रेम से श्रीमती जी ने इसे तैयार भी कर दिया सो इसका क्रेडिट हम
स्मिता को ही देना चाहेंगे। तो लीजिए पेश है पालक कोफ्ता कढ़ी।
पालक कोफ्ता क्यों ? दरअसल हम रात डेढ़ बजे घर पहुंचते हैं । इस बीच सभी लोग खाना खा चुके होते हैं। बार बार बर्तन में चम्मच चलाते रहने से गोभी और पकौड़ेवाली कढ़ी जैसे आइटम हमारी बारी तक बर्बाद हो जाते है क्योंकि उनमें टूट फूट हो जाती है। पालक कोफ्ता नहीं टूटता।
सारी सामग्री अपने अंदाज़ से लें
करीब एक पाव पालक को बारीक बारीक काट लें। बेसन लें और पालक में मिलाएं। अजवायन, जीरा, खड़ा धनिया, हींग और नमक मिलाएं । कोशिश करें कि पालक में पानी मिलाने की ज़रूर न पड़े और उसकी नमी से ही बेसन का पकोड़ी लायक पेस्ट बन जाए। इसके पकोड़े तल लिए जाएं। ध्यान रहे इतना अधिक न तलें कि रंग हरा से सुनहरा हो जाए :) अब ताज़े दही में बेसन और पानी डाल कर कढ़ी का घोल तैयार कर लें। आंच पर चढ़ा दें। ज़ायके के मुताबिक नमक डालें। मन करे तो लहसुन अदरक पेस्ट भी उबलते समय डाला जा सकता है। अच्छी तरह कढ़ने के बाद उतारने से पहले हींग पाऊडर डालें।
छोटी फ्राईपैन में घी या तेल लें। खड़ी लाल मिर्च डालें। पंचफोळन यानी राई, जीरा, मेथीदाना, कलौंजी और कालीमिर्च का तड़का लगाएं। थोड़ा लाल मिर्च पाऊडर डालें और इस बघार को कढ़ी में डाल दें।
बस , अब तैयारशुदा पालक कोफ्ते कढ़ी में डालें और कुछ देर गर्म करें। फिर आंच से उतार कर पांच मिनट रूकें और परोसगारी के लिए तैयार हो जाएं। कढ़ी में तैरते हरे हरे कोफ्ते देखकर हमारा दिल तो बाग बाग हो गया था।
टिप- इस डिश के साथ या तो चावल खाएं वर्ना मोटे आटे की रोटियां ही अच्छी लगेंगी जैसे मक्का, ज्वार या बाजरा। हमने इनमें से कुछ नहीं खाया बल्कि गेहूं के आटे में थोड़ा मक्के का आटा मिलाकर रोटियां बनाई जो देर रात ठंडी ठंडी खाईं। इस डिश की खासियत है कोफ्ते टूटे नहीं और कढ़ी में अनावश्यक गाढ़ापन भी नहीं आया ।
कुछ ग़लती रह गई हो तो माफी दीजिएगा, हड़काइएगा नहीं।