दाल रोटी चावल सदियों से नारी ने इसे पका पका कर राज्य किया हैं , दिलो पर , घरो पर। आज नारी बहुत आगे जा रही हैं सब विधाओं मे पर इसका मतलब ये नहीं हैं कि वो अपना राज पाट त्याग कर कुछ हासिल करना चाहती हैं। रसोई की मिलकियत पर से हम अपना हक़ तो नहीं छोडेगे पर इस राज पाट का कुछ हिस्सा पुरुषो ने होटल और कुछ घरो मे भी ले लिया हैं।

हम जहाँ जहाँ ये वहाँ वहाँ

Monday, July 14, 2008

अरबी के पत्तो के पतौड़े

ये रेसिपी डॉ मंजुलता जी ने हस्तलिखित दी हैं और लेखिका की मै बेटी हूँ ।

क्लिक करे और बड़ा करके आराम से पढ़ के , प्रिंट निकाल कर , बनाए । तस्वीर नीचे हैं मेरी माता श्री की किचेन की क्योकि ये विधि भी उनकी ही हैं । हम तो खाते हैं पर इस बार खाने से पहले फोटो ले ली । सबसे अच्छी बात हैं की अरबी के पत्ते भी घर के किचेन गार्डन से ही हैं । और अरबी को लखनऊ मे घुइयाँ कहते हैं ओअर दिल्ली के सब्जी वाले इस नाम से नितांत अपरचित हैं ।

6 comments:

Manvinder said...

Rachana ji,
barsaat ke mossam mai etni cruchi parnchi recipy pesh kerne ke liye danyawaad.
isme heeng aslee waali dale to oor b testy ho jaenge PATTOR
Manvinder

Parul said...

bihar me isey ARUAAaur KACHUU kahtey hain..post pasand aayi..

रंजना [रंजू भाटिया] said...

जम्मू में बहुत खाया करते थे क्यूंकि घर में लगे हुए थे ...याद दिला दी आपने ..बरसात भी है बनाने पड़ेंगे :)

Lavanyam - Antarman said...

रचना जी,
गुजरात मेँ इन पत्तोँ का हरा रँग ओपर दीखे इस तरह मसाले पडे बेसन को अँदर, तहोँ पे लगाया जाता है
और अरबी के पत्तोँ के इस व्यँजन का नाम "पाँतरा " है -
भाँप से सीजे हुए पाँतरे,
पाचन मेँ हल्के होते हैँ
पर उन्हेँ बघार देने से तेल के अनुपात से
वे थोडे भारी हो जाते हैँ
पर तब भी लगते हैँ बडे स्वाद !!
स स्नेह,
- लावण्या

anitakumar said...

हमें भी पातरा की याद आ गयी

गरिमा said...

यह मुझे बहुत पसन्द है, पर बनाती नही हाथ मे खुजली होने लगती है। :)